life without petrol

 

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वर्ष 2040, आज का दिन :

पेट्रोल व डिजल अब केवल राष्ट्रपती, प्रधानमंत्री और सेना के लिए ही उपलब्ध है। शहरों में लोगों ने सड़कों पर अपने वाहन जहां जगह मिली वही छोड़ दिए हैं। सेना ने अस्पताल सहित कई प्रमुख स्थानों को अपने कब्जे में कर लिया है। एम्बुलेंस तो अब केवल जरूरतमंदो के लिए है, महत्वपूर्ण एवं विषेश व्यक्ति के लिए ही वह अस्पताल से बाहर निकाली जाती है।

पेट्रोल व डीजल के बगैर चलनेवाले कई वैक्लिपक वाहन सड़कों पर भारी संख्या में नजर आने लगे हैं। इलेक्ट्रिक कार के साथ अब सड़कों पर बैलगाडी, घोडागाड़ी एवं साइकिल रिक्षा ज्यादा नजर आते हैं। साइकिल के अच्छे दिन वापस लौट आए हैं। डीज़ल पर चलनेवाली रेलगाड़ी अब वापस भाप के इंजनपर चलने लगी है। इतना ही नहीं बिजली से चलनेवाली रेलगाड़ी भी अब बिजली की उपलब्धता के अनुसार ही मार्ग तय कर रही है।

 

वर्ष 2020, आज का दिन :

जो देश पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति के लिए दुसरे देशो पर निर्भर रहते हैं वे हमेषा भविश्य में अचानक आनेवाली किसी भी तरह की समस्या का सामना करने के उद्देष्य से अपने यहां इतने पेट्रोलियम पदार्थों का स्टॉक संग्रह करने रखते हैं की लगभग 8 से 12 सप्ताह तक आसानी से लोगों को उपलब्ध करवा सकें और व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।

इन दिनों पेट्रोल पंप मालिकों की हड़ताल शुरू है। हड़ताल के दुसरे ही दिन स्टॉक खत्म हो जाने के कारण कुछ पेट्रोल पंप बंद हो गए। अगले तीन दिन में बाकी के पेट्रोलपंपो का स्टॉक भी खत्म हो जाएगा। चार दिन बाद ट्रक एवं कार रास्ते में ही रूक जाएंगे। दोपहिया वाहनों की स्थिती तो मात्र दो दिन में पस्त हो जाएगी। इनके साथ ही बड़े शहरों में कचरा ढोनेवाली गाड़ियाँ, शव-वाहिनी, बच्चों को स्कूल ले जानेवाली स्कूल बसों के पहिले भी पेट्रोल के अभाव में थम जाएंगे। जिन शहरों में सी.एन.जी. एवं एल.पी.जी. गैस की सुविधा होगी वहां स्थिति थोड़ी भिन्न होगी। वहां पेट्रोल एवं डीजल से चजनेवाले वाहन तो ठप्प पड़ जाएंगे मगर गैस से चलनेवाले वाहन सड़कों पर तेजी से दौड़ते नजर आएंगे।

 

वर्ष 2025

यश एक बड़ी कंपनी में मार्केटिंग मॅनेजर है। देशभर में घुमना, लोगों से मिलना, मार्केट की स्थिती उतार-चढ़ाव पर नजर रखना और ग्राहकों की मनः स्थिती को समझकर अपना माल आगे ले जाना यही उसका काम है। अपने ऑफीस में काम करनेवाली ग्रेस से उसकी अच्छी दोस्ती है। भविष्य को लेकर दोनों के सपने एक जैसे ही हैं। दोनों ही घर, गाड़ी और सुख-सुविधा के तमाम साधन खरीदना चाहते हैं, दोनों की इच्छाएं और महत्वकांक्षाए भविष्य में बहुत आगे जाने की है। शायद इसलिए भी उनकी दोस्ती दिनोंदिन गहरी होती जा रही है।

 

”अरे यश, सुना क्या ?“

”क्या“ ?

”अरे आत पेट्रोल 1000 रूपए लीटर हो गया है।“

”इसे उच्चांक कहें या निम्नांक, समय में नहीं आ रहा है।“

”हूं महंगाई और बढ़ेगी।“

”अरे महंगाई अगर और बढे़गी तो क्या होगा ?“

पहले ही तो महंगाई ने हमारा जीना हराम कर दिया है।

”अरे कंपनी जिंदाबाद, वो देगी पेट्रोल अलाऊंस (खर्च) और तुम क्यों चिंता कर रही हो। मैं हूँ ना।“

”कंपनी क्या तुम्हें तुम्हारी तनख्वाह से ज्यादा पेट्रोल खर्च देगी ? अब तो सारे नियम बदल जाएंगे। अब कंपनी की सबसे पहली प्राथमिकता पेट्रोल व ट्रांसपोर्ट का खर्च कम करने की होगी। अब कंपनी अपने खर्चों को कम करके उसमें मुनाफा ज्यादा कमाने पर ही जारे देगी। कंपनी में उतने ही लोग रहेंगे जितने की जरूरत है, बाकी सब बाहर जाएंगे।“

”ग्रेस मेरे पास इसके समस्या का एक हल है।“

”क्या ?“

”अगर हम दोनों शादी कर ले तो ! हमारे शादी करने से इस कमरतोड़ महंगाई से हमें निजात मिलेगी या नहीं, ये तो मुझे पता नहीं, लेकिन तुम अगर मेरे साथ होगी तो इसका अहसास भी नहीं होगा।“

”अरे ये कोई समय है मजाक करने का“ ?

”मजाक नहीं, ये मैं दिल से कह रहा हूँं ग्रेस। मुझे अपनी बाकी की जिंदगी तुम्हारे साथ गुजारना अच्छा लगेगा। लेकिन क्या तुम मुझे पसंद नहीं करती।?“

”नहीं यश ऐसा नहीं है। मुझे लगा की तुम कभी शादी के बारे में सोचोगे ही नही। तुम्हारे लिए तो दोस्ती से भी ज्यादा महत्वपूर्ण तुम्हारा कॅरियर था ना।?“

अगले ही महिने दोनों की शादी हो गई और उनके वैवाहिक जीवन की शुरूवात हुई। महंगाई और पेट्रोल की बढ़ती किमत के कारण उनके वैवाहिक में केवल आवश्यक जरूरतों का स्थान रह गया था। सबसे पहले गाड़ी बेच दी गई और सरकारी वाहन से यात्रा की जाने लगी। खर्चों में भागीदारी (एक्सपेंसेस शेयरिंग) और ब्रीजिंग गैप जैसे शब्दों का उपयोग ज्यादा होने लगा। पुराने सपने तो अब कल्पनाओं में ही रह गए और नए सपने वो तो खुली आँखो से भी कोसों दूर थे। आरामदायक वस्तुएँ भी पहुँच से बाहर होती गई।

पेट्रोल की बढ़ती किमतों से पुरा देश परेशान हो गया था। इच्छा होने के बावजुद अनेक बातें संभव नहीं थी। डीजल शवदाहिनी के लिए सप्ताह भर की वेटिंग थी। विद्युत शवदाहिनी का भी यही हाल था। निर्धन लोगों ने तो अब ईंधन के रूप में लकड़ी का विकल्प ढुंढ लिया था। सड़क किनारे बरसों से खड़े होकर लोगों को छाया देनेवाले घने वृक्षों को बेदर्दी से काटा जाने लगा।

नए कानून के अनुसार अपने परिवार को बढ़ाने की इच्छा रखनेवालों को बकायदा आवेदन देकर अनुमति लेना आवश्यक था। अस्पताल की सुविधानुसार व्यवस्था पर असर न हो, इसका विशेष ध्यान रखते हुए तारीख दी जाने लगी। अगर किसी की तारीख मिस हो जाती तो उसे फिरसे आवेदन जमा कर नयी तारीख लेनी पड़ती थी। धीरे-धीरे सामाजिक व्यवस्था ने पेट्रोल व डीजल की समस्या में सामजंस्य बिठाना शुरू किया। यह भविश्य में आनेवाले दिनों का एक नमुना मात्र था।

बिजली से चलनेवाली गाड़ियाँ तो थी मगर बिजली नदारद थी। अब बिजली अतिआवष्यक सेवाओं के लिए पहले और फिर ग्राहकों के लिए और उसके बाद आरामदायक वस्तुओं के उपयोग के लिए उपलब्ध होती थी। एल.पी.जी., सी.एन.जी. इथेनाल, हाइड्रोजन कार जैसे विकल्प भी महंगे पड़ने लगे। इनका उपयोग केवल धनवान लोग ही कर सकते थे।

चारों तरफ अव्यवस्था और अस्थिरता की आलम था। लोगों का ..

 

वर्ष 2035

आज सरकार ने अधिकारिक तौर पर घोशणा करते हुए कहा कि खाड़ी देषों में व्याप्त अस्थिर वातावरण के कारण भारत को तेल मिलना मुश्कील है इसलिए तत्काल प्रभाव से पेट्रोल, डीजल व केरोसिन की बिक्री बंद की जा रही है।

आज अपने पास मात्र चार सप्ताह तक के तेल का ही स्टॉक होने के कारण अब हमें ईंधन के विकल्पों की ओर रूख करना होगा और जनता को अब अपनी जीवन-पद्धति में बदलाव लाना होगा।

”यश, तुम कहां हो ?“

”ग्रेस, मैं मदुराई में हुँ।“

”अरे तुम्हें कुछ पता भी है मुंबई में क्या हो रहा है ?“ पेट्रोल पंप लुटे जा रहे हैं, गाड़ियां रोककर चाकू की नोंक पर गाड़ी से पेट्रोल निकाला जा रहा है।

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”लोकल भी निर्धारित समय के लिए चलायी जा रही है, सुबह चार घंटे और शाम चार घंटे। बस सेवा का तो कोई भरोसा नहीं, कभी भी बंद पड़ सकती है। मदुराई के हालात कैसे हैं ?“

”हम यहां साइकिल में घुम रहे हैं। चेन्नई जानेवाली प्राइवेट बस की टिकीट दर तो हवाई जहाज की टिकट दर से भी महंगी हो गई है। यहां जगह-जगह सड़कों पर लोगों ने अपनी गाड़ियाँ छोड़ दी है। कुछ जगहों पर एल.पी.जी. ऑटो की सुविधा तो है परंतु वो भी बहुत महंगे हैं, पेट्रोल पंप तो सुख गए हैं। मदुराई स्टेशन की सारी ट्रेने रद्द कर दी गई हैं।“

”अरे, फिर तुम घर वापस कैसे आओगे“ ?

”जैसे ही मुझे कोई साधन मिलेगा, मैं वैसे ही मुंबई पहुँचने का प्रयास करता हूँ। चेन्नई जाकर वहां से ट्रेन से आऊंगा। फिर भी एक सप्ताह तो लग ही जाएंगे क्योंकि जब बिजली होगी, तभी तो ट्रेन आगे बढे़गी। नहीं तो, बस बैठे रहो जंगल में। तुम अपनी व्यवस्था का ज्यादा ध्यान रखो। वापस लौटने की कोई व्यवस्था न हो तो तुम घर से बाहर मत निकलना।“

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आज का दिन 2040 :

पेट्रोलियम पदार्थों की बिक्री बंद करने का कठोर नियम तो सरकार ने जनता से सामने लागु कर दिया जिससे ऐसा लगने लगा था कि किसी पुराने दौर (काल) में यहां पेट्रोल, डीजल व अन्य पेट्रोलियम पदार्थ हुआ करते थे।

देश वैसे तो एकजुट था लेकिन कुछ हद तक उसमें आंतरिक दरारें पड़ गई थी। कुछ राज्यों में वहां के ताकतवर लोगों ने सरकारी तेल कंपनियों के तेल संग्रह (स्टॉक) पर जबरन अपना कब्जा कर लिया था। एक दो जगह तो लोगों ने पुलिस कारवाई के भय से सारा स्टॉक जलाकर नष्ट कर दिया था, जिस कारण प्रशासन इससे दो हाथ दूर ही रहता था। जिन राज्यों में सरकारी रिफायनरी थी वहा माफियाओं ने कब्जा कर लिया था। प्राइवेट रिफाइनरी तो पहले ही संस्थान में तब्दील हो गए थे।

ये रिफाइनरीज अब सत्ता और धन के दुसरे महत्वपूर्ण केंद्र बन गए थे और ये भारत में नहीं बल्कि पुरे विश्व में राज कर रहे हैं। ये विश्वभर में अपने रिफायनरी से आपूर्ति कर वहां से काला धन प्राप्त कर रहे थे। एसे ताकतवर लोगों ने अपनी रिफायनरी की सुरक्षा के लिए जबर्दस्त सैन्य बल तैनात कर दिया। वे ऐसा व्यवहार करते मानों उनकी दुनिया बाकियों से अलग है।

अफगानिस्तान जैसी स्थिति अब अन्य राज्यों में नजर आने लगी। अब सत्ता की कमान पेट्रोल के स्टॉक पर आंका जाने लगा। शहर के बाहर स्थित तेल कंपनियों के गोदाम (स्टॉक) आज टोलियों के अधिकार में है। हलदिया, उरण, मेरठ सहित कई अन्य स्थानों पर तेल अब बंदुक की नोक पर उपलब्ध है।

तेल का एक भी टँकर आज एक किलोमिटर तक बगैर सुरक्षा के नहीं जा सकता। दुरी लंबी हो या छोटी, टँकर तेल से भरा होत तो उसकी सशक्त सुरक्षा बंदोबस्त करना जरूरी हो गया है। गुजरात का हजीरा अब नई मुंबई व दिल्ली हो गया है। देश की सी.एन.जी. की पाईपलाईनें तो कबसे तोड़कर बेच दी गई है। गैस आधारित पॉवर प्लांटस को बंद हुए अरसा हो गया।

कोयले के क्या कहने, वह तो अब रूपये जैसे हो गए हैं उसकी खनक भी सिक्कों से ज्यादा मधुर लगने लगी है। कोयले की महत्वपुर्णता के कारण देश की अर्थव्यवस्था अब कोयले पर आधारित हो गई है। छोटे-बडे़ तमाम उद्योग-धंधे अब कोयले पर चल रहे हैं। घर में उपयोग करने के लिए रोज गाड़ियों में भरकर कोयला लाकर बिकने लगा है। कम-ज्यादा होने के बावजुद लोग एक-दुसरे की मदद करने लगे हैं। बिजली है मगर मात्र तीन घंटे के लिए। खाना बनाने के लिए हर छोटेसे लेकर बड़े घरों तक में कोयले की सिगड़ी का उपयोग किया जा रहा है। रेल विभाग ने पुराने भाप के इंजिन का उपयोग षुरू कर दिया है। बिजली व भाप के इंजिन के सहारे रेलगाड़िया तो चलने लगी हैं मगर अब उनका समय पहले की तुलना में दस गुना ज्यादा बढ़ गया है। गाड़िया दिनभर चलती हैं और रातभर खड़ी रहती है। इंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग करने वाले लोगों ने तो सालों पहले जंगल के जंगल साफ कर दिए हैं।

जनजीवन एक बार फिर साइकिल व बैलगाडी पर दौड़ने लगा है। घोडागाड़ी, तांगे फिरसे नजर आने लगे है। मोबाईल के कारण लगभग बंद हो चुके लैंडलाईन फोन एक बार फिर अधिकाधिक उपयोग किए जाने लगे है। क्योंकि वे बिजली के बगैर चलते हैं। अब लोग घर से ऑफीस बैलगाड़ी से जाकर कम्प्युटर पर काम कर रहे है। परिवर्तन की लहर चारों तरफ फैल गया है।

परंतु पहले के जैसी गती अब नहीं रही। जीवन की गती भी रफ्तार धीमी हो गई है। दिल्ली जाना है ? चार दिन, चेन्नई में माल पहुँचाना है ? एक महिना, मुंबई में रीश्तेदार का देहांत हो गया ? वही रहो, आओ मत।

अब सड़क पर मोटे लोग नजर नहीं आते। डायबिटि़ज, शुगर, स्ट्रेस, हार्टअटैक जैसी बिमारियों के नाम भी सुनने को यदा कदा ही मिलते हैं अब ज्यादातर लोग पैदल चलते हैं। किसी को काम की जल्दबाजी नहीं हैं एक-दुसरे के समय का ख्याल रखा जाने लगा है। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आ गया है कि प्रकृति प्रद्त्त सुविधाओं का दुरूपयोग करने पर दुःख और कष्ट के सिवाय कुछ नहीं मिलता। इसलिए सारी सुख-सुविधाओं का उपयोग सही प्रकार से करते हुए उनके दुरूपयोग से बचना चाहिए तभी जीवन सुखी एवं समृद्ध होगा।

 

समीर मुले

9767052878

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